रविवार, 7 जून 2009

तलाश

इन आंखों से बहता हुआ हर कतरा तेरा दामन ढूंढे
तपती धूप में जलती हुई ये धरती अपना सावन ढूंढे

भोर भये भी घोर अंधेरा छाया रहे मेरे ही घर में
आशा की एक नयी किरन क्यों रोज पराया आंगन ढूंढें?

फूल स्वप्न के, प्रीत का धागा, मन ही मन में माला गूंथी
बन बन माला लेकर अपना प्रीतम कोई जोगन ढूंढें

जब भी देखूं, गम को छुपाकर खुशियों का ही अक्स दिखाए,
झांक झांक हर मन में मेरी छाया ऐसा दर्पन ढूंढें

कहीं अनोखा रासरंग है, कहीं मुरली की ध्वनितरंग है,
सदियों से प्यासी मीरा हर युग में अपना मोहन ढूंढें!

1 टिप्पणी:

  1. भोर भये भी घोर अंधेरा छाया रहे मेरे ही घर में
    आशा की एक नयी किरन क्यों रोज पराया आंगन ढूंढें?

    बहुत उम्दा किस्म के शेरों के लिये बधाई...
    बहुत बेहतरीन गजल है
    पढ़वाने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद
    वीनस केसरी

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